
स्वर्गीय श्रीमती यशोदा मिश्रा (दीदी) एक नेकदिल, मेहनती और दयालु व्यक्तित्व की धनी थीं। वे हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तत्पर रहती थीं और समाज के हर व्यक्ति के प्रति उनके मन में प्रेम, सम्मान और संवेदनशीलता थी।

मेरी दीदी — मेरी दादी, मेरी दुनिया मैं ऋषि, आज अपने जीवन के उस सबसे अहम हिस्से को फिर से जी रहा हूँ, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता।
उस हिस्से का नाम है — मेरी दादी, मेरी “दीदी”, श्रीमती यशोदा मिश्रा।

मैं अमित शर्मा हूँ। आज जब मैं स्वर्गीय श्रीमती यशोदा बाई मिश्रा जी, हमारी प्रिय “दुलहरा वाली दादी”, को याद करता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे स्मृतियों का एक विशाल संसार मेरे सामने जीवंत हो उठता है। कुछ लोग अपने जीवन में केवल रिश्ते नहीं बनाते, बल्कि अपने व्यवहार, स्नेह और कर्मों से लोगों के हृदयों में एक स्थायी स्थान बना |

मैं विवेक हूं।
संयमी, सीमित और छोटे दायरे में रहने वाला इंसान।
मेरा बचपन भी कुछ ऐसा ही था—एक छोटी सी बस्ती, जहां मुश्किल से दस-पंद्रह घर थे और उन्हीं लोगों के बीच मेरा पूरा संसार सिमटा हुआ था। करीब बारह-तेरह वर्षों तक मेरी दुनिया बस उसी बस्ती तक सीमित रही।

ममता की वह छांव
श्रीमती यशोदा मिश्रा (दीदी) की स्मृतियों में गांव की गलियों में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो केवल एक व्यक्ति नहीं होते, बल्कि पूरे गांव की आत्मा बन जाते हैं। उनका होना हर किसी को सुरक्षा, अपनापन और स्नेह का एहसास कराता है।

जादूगर दादी
बहुत खुशनसीब होते हैं वे बच्चे जिन्हें बचपन में दादा-दादी और नाना-नानी का प्यार मिलता है। मैं भी खुद को उन खुशकिस्मत लोगों में गिनता हूँ, जिन्हें एक नहीं बल्कि दो-दो दादियों का स्नेह मिला।
