Vivek Soni

दुलहरा वाली दीदी

मैं विवेक हूं।
संयमी, सीमित और छोटे दायरे में रहने वाला इंसान।
मेरा बचपन भी कुछ ऐसा ही था—एक छोटी सी बस्ती, जहां मुश्किल से दस-पंद्रह घर थे और उन्हीं लोगों के बीच मेरा पूरा संसार सिमटा हुआ था। करीब बारह-तेरह वर्षों तक मेरी दुनिया बस उसी बस्ती तक सीमित रही।

फिर धीरे-धीरे उम्र बढ़ी और बस्ती से बाहर निकलना शुरू हुआ। नए दोस्त बने, उनके साथ खेलना, घूमना, झगड़ना और फिर शाम को घर लौट आना—ये सब जीवन का हिस्सा बन गया। उन्हीं दोस्तों में दो भाई थे—राज और ऋषि। उनके साथ मेरा रिश्ता सिर्फ दोस्ती का नहीं था, बल्कि परिवार जैसा अपनापन था। खेलना भी साथ, पढ़ना भी साथ।

उनके घर जाना तो जैसे मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था।

कारण सिर्फ अखबार नहीं था, जबकि अखबार मुझे कहीं भी मिल सकता था। असली वजह थी वहां मिलने वाला अपनापन… और “दीदी” का प्यार।

रिश्ते में वे मेरी बड़ी मां लगती थीं, लेकिन राज और ऋषि की दादी थीं। गांव में सब उन्हें सम्मान से “दीदी” कहते थे। पूरे इलाके में उनकी पहचान “दुलहरा वाली दीदी” के नाम से थी, क्योंकि उनका मायका दुलहरा गांव में था। ऋषि प्यार से उन्हें “लेडी डॉन” कहता था।

लेकिन उनकी असली पहचान किसी नाम से नहीं, बल्कि उनके काम से थी।

दीदी का पूरा जीवन समाज सेवा में बीता। बिना किसी लालच और बिना किसी शुल्क के वे लोगों की मदद करती थीं। गांव में किसी का बच्चा बीमार पड़ जाए, किसी की हड्डी खिसक जाए, किसी के घर दुख आ जाए—सबकी पहली उम्मीद दीदी ही होती थीं।

कई ऐसे बच्चों का इलाज उन्होंने किया जिन्हें बड़े-बड़े डॉक्टर भी ठीक से समझ नहीं पाते थे। बड़े-बूढ़ों की टूटी या खिसकी हड्डियां वे इतनी आसानी से सही कर देती थीं कि लोग हैरान रह जाते थे। क्रिकेट खेलते समय मेरी भी हड्डियां कई बार चोटिल हुईं और हर बार दीदी ने ही उन्हें ठीक किया।

लेकिन कभी किसी से एक रुपया नहीं लिया।

उनके लिए सेवा ही सबसे बड़ा धर्म था।

मुझे आज भी याद है—राष्ट्रीय पर्वों पर सुबह-सुबह हाथ में तिरंगा लेकर प्रभात फेरी में शामिल होना उनका नियम था। वे सिर्फ अपने परिवार या गांव तक सीमित नहीं थीं; उनके मन में देश, समाज और संस्कारों के लिए अद्भुत सम्मान था।

मेरा और दीदी का रिश्ता बहुत स्नेह भरा था। कभी वे मुझे बेटे जैसा प्यार देतीं, तो कभी अपने नाती-पोतों की तरह दुलारतीं। उनके आशीर्वाद भी बिल्कुल अलग होते थे।

बाकी लोग कहते थे—“खुश रहो।”

लेकिन दीदी कहती थीं—

“खुश रहो विवेकवा, खूब पढ़ो-लिखो, खूब आगे बढ़ो, भगवान बनाये रखें।”

उनके शब्द सीधे दिल में उतर जाते थे।

मैं कक्षा 9 में था, तब से उनका आशीर्वाद लगातार मिलता रहा। राज मुझसे एक कक्षा आगे था और मैं उसकी पुरानी किताबों से पढ़ाई करता था। स्कूल जाने से पहले मैं रोज उनके घर रुकता, अखबार पढ़ता और फिर राज-ऋषि के साथ स्कूल जाता।

दीदी हर दिन हमें पांच-दस रुपये टॉफी या समोसा खाने के लिए देती थीं।

मैं पंद्रह साल का था, लेकिन आज भी वो सुबहें मेरी स्मृतियों में जिंदा हैं—दीदी का दरवाजे पर खड़ा होना, मुस्कुराकर बुलाना और माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद देना।

वे कभी मेरे बारे में कोई बुरी बात सुनना पसंद नहीं करती थीं। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, उनका स्नेह मेरे लिए और गहरा होता गया। कई बार मुझे आशीर्वाद देते-देते उनकी आंखें भर आती थीं। ऐसा लगता था मानो वे सच में मेरे लिए भगवान से प्रार्थना कर रही हों।

दीदी की एक और बात पूरे गांव में मशहूर थी।

वे गालियां भी देती थीं।

लेकिन उनकी गालियां इतनी मीठी होती थीं कि लोग जानबूझकर गलतियां करते थे ताकि दीदी उन्हें डांटें। उनके शब्दों में भी प्यार होता था। ऐसा प्रभावशाली और जीवंत स्वभाव बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है।

समय बीता।

राज इंजीनियर बन गया। ऋषि भी इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंच गया। मैं जब भी उनके घर के सामने से गुजरता, अगर दीदी की नजर मुझ पर पड़ जाती तो वे मुझे तुरंत बुला लेतीं।

“आवा विवेकवा… बैठा।”

फिर कुछ खिलातीं या जेब में दस रुपये रख देतीं और कहतीं—

“जा, समोसा खाय लीन्हे।”

और फिर पूछतीं—

“राज का फोन आया कि नाहीं?”

वे सबको प्यार करती थीं, लेकिन राज के लिए उनका स्नेह कुछ ज्यादा ही था। और सच कहूं तो राज भी खुद को सबसे ज्यादा भाग्यशाली मानता था कि उसे ऐसी दादी मिलीं।

और फिर…

हम सबकी “दीदी” चली गईं।

सिर्फ अपने परिवार को नहीं, बल्कि पूरे इलाके को रोता हुआ छोड़कर।

उस दिन पहली बार मैंने महसूस किया कि कुछ लोग सिर्फ इंसान नहीं होते, वे पूरे समाज की आत्मा होते हैं। उनके जाने के बाद जगहें खाली नहीं होतीं… जीवन खाली हो जाता है।

आज भी जब मैं उस रास्ते से गुजरता हूं, जहां दीदी बैठा करती थीं, तो ऐसा लगता है जैसे अभी आवाज आएगी—

“आवा विवेकवा…”

मेरे जीवन का एक बड़ा हिस्सा उनके आशीर्वाद और प्रेम की छांव में गुजरा है। उनकी यादें मेरी आत्मा में बसी हुई हैं।

लेकिन एक सच मैं जानता हूं—

मैं दीदी को एक दिन जरूर भूल जाऊंगा…

उस दिन, जब मैं अपनी आखिरी सांस लूंगा।

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