
ममता की वह छांव
श्रीमती यशोदा मिश्रा (दीदी) की स्मृतियों में
गांव की गलियों में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो केवल एक व्यक्ति नहीं होते, बल्कि पूरे गांव की आत्मा बन जाते हैं। उनका होना हर किसी को सुरक्षा, अपनापन और स्नेह का एहसास कराता है। मेरे जीवन में भी ऐसी ही एक महान शख्सियत थीं — श्रीमती यशोदा मिश्रा, जिन्हें पूरा गांव प्यार और सम्मान से “दीदी” कहकर पुकारता था। उनकी उपस्थिति केवल मेरे लिए ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए प्रेरणा, स्नेह और ममता का प्रतीक थी।
जब से मैंने होश संभाला, तब से दीदी को अपने आसपास पाया। बचपन की मेरी यादों में उनका चेहरा हमेशा एक स्नेहभरी मुस्कान के साथ मौजूद है। मां अक्सर मुझे बताया करती थीं कि बचपन में मेरी तबीयत बहुत खराब रहा करती थी। कभी तेज बुखार, कभी कमजोरी, तो कभी ऐसी हालत कि घर वाले घबरा जाते थे। उन कठिन दिनों में सबसे पहले दीदी को ही बुलाया जाता था।
जैसे ही किसी को मेरी तबीयत बिगड़ने की खबर मिलती, कोई न कोई दौड़कर दीदी को बुलाने चला जाता। मां कहती हैं कि दीदी के घर से निकलते ही उनके मन को आधी राहत मिल जाती थी। दीदी घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले मेरे सिर पर हाथ फेरतीं और बड़े प्यार से कहतीं, “कुछ नहीं होगा मेरे बच्चे को, जल्दी ठीक हो जाएगा।”
शायद मैं उस समय बहुत छोटा था, इसलिए मुझे वे पल याद नहीं हैं, लेकिन मां की आंखों में आज भी वह विश्वास दिखाई देता है, जो उन्हें दीदी पर था। यह जानकर मेरा मन हमेशा उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता से भर जाता है। मुझे लगता है कि मेरा और उनका रिश्ता केवल पड़ोस का नहीं था, बल्कि किसी गहरे आत्मीय बंधन से जुड़ा हुआ था।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। मैं बड़ा होने लगा और मेरी दुनिया में क्रिकेट सबसे महत्वपूर्ण चीज बन गया। गांव का मैदान, धूल से भरी पगडंडियां और दोस्तों के साथ बिताए गए घंटे मेरे जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा बन गए थे।
मैं, राज, सूरज और ऋषि — हम चारों की टोली पूरे गांव में मशहूर थी। सुबह से लेकर शाम तक हमारे हाथों में बल्ला और गेंद रहती थी। और हमारे खेल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था — दीदी के घर के पास का वह खुला स्थान, जहां हम घंटों क्रिकेट खेला करते थे।
लेकिन क्रिकेट के साथ शरारतें भी तो जुड़ी रहती हैं।
कभी मेरी तेज शॉट लगाई हुई गेंद दीदी के घर की छत पर जा गिरती, तो कभी सूरज की गेंद सीधे उनके आंगन में पहुंच जाती। फिर हम सब एक-दूसरे का चेहरा देखते और डरते-डरते उनके घर की ओर बढ़ते।
हमें लगता था कि इस बार जरूर डांट पड़ेगी।
लेकिन जैसे ही दीदी हमें देखतीं, उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।
“फिर आ गई गेंद?”
और हम सब सिर झुकाकर खड़े हो जाते।
वह हंसते हुए गेंद उठाकर हमें दे देतीं और कहतीं, “जाओ, खेलो… लेकिन थोड़ा संभलकर।”
हमारी शरारतों की सूची बहुत लंबी थी। कभी गलती से खिड़की के पास गेंद चली जाती, कभी उनके घर के सामने इतना शोर मचाते कि आसपास के लोग परेशान हो जाते। लेकिन दीदी ने कभी हमें डांटा नहीं। उन्होंने हमेशा हमारी गलतियों को बच्चों की मासूम हरकत समझकर मुस्कुराते हुए नजरअंदाज कर दिया।
आज सोचता हूं तो लगता है कि उस समय हमें केवल एक पड़ोसी का प्यार नहीं मिल रहा था, बल्कि मां जैसी ममता मिल रही थी।
धीरे-धीरे समय बदलता गया। स्कूल के दिन समाप्त हुए और कॉलेज का समय आ गया। जिम्मेदारियां बढ़ने लगीं। पढ़ाई का दबाव बढ़ा और क्रिकेट का शौक धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा।
अब न मैदान में पहले जैसी रौनक थी और न ही हमारी टोली पहले की तरह रोज इकट्ठा हो पाती थी।
लेकिन एक चीज नहीं बदली — दीदी का स्नेह।
कॉलेज जाने के बाद भी जब मैं घर लौटता, तो अक्सर दीदी को घर के बाहर बैठा पाता। कभी सुबह की धूप सेंकते हुए, कभी पड़ोस की किसी महिला से बातें करते हुए, तो कभी यूं ही रास्ते पर नजरें टिकाए हुए।
जैसे ही मैं वहां से गुजरता, उनकी आंखें मुझे पहचान लेतीं।
“कैसे हो बेटा?”
“कॉलेज से आ गए?”
“पढ़ाई कैसी चल रही है?”
उनके ये साधारण से प्रश्न मेरे लिए असाधारण महत्व रखते थे।
कई बार कॉलेज का दिन बहुत थकाने वाला होता था। कभी परीक्षा की चिंता होती, कभी भविष्य को लेकर मन में उलझन रहती। लेकिन दीदी की वह मुस्कान और दो मिनट की बातचीत मेरे मन का बोझ हल्का कर देती थी।
मुझे ऐसा लगता था जैसे कोई अपना मेरा इंतजार कर रहा हो।
समय आगे बढ़ता रहा और जीवन ने नए रंग दिखाने शुरू कर दिए। लेकिन जीवन केवल खुशियों का नाम नहीं है।
एक समय ऐसा भी आया जब मेरी अपनी तबीयत खराब रहने लगी। शरीर कमजोर पड़ने लगा और मन भी पहले जैसा उत्साहित नहीं रहता था।
उन दिनों जब भी मैं दीदी के पास जाता, वह सबसे पहले मेरी तबीयत के बारे में पूछतीं।
“अब कैसी तबीयत है?”
“दवा समय पर ले रहे हो ना?”
“खाना ठीक से खाया करो बेटा।”
उनकी आवाज में जो चिंता होती थी, वह किसी रिश्ते की औपचारिकता नहीं थी। वह एक मां का स्नेह था।
कई बार जब मैं अपनी परेशानी बताता, तो उनकी आंखें नम हो जाती थीं। मुझे देखकर उन्हें दुख होता था। उनकी चिंता देखकर मेरे मन में हमेशा यही भावना आती थी कि दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के किसी और के लिए इतना सोचते हैं।
उनका वह स्नेह मेरे लिए किसी अनमोल आशीर्वाद से कम नहीं था।
आज समय बहुत आगे निकल चुका है।
बचपन की वह क्रिकेट की टोली अब पहले जैसी नहीं रही। हम सब अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए हैं। गांव की गलियां वही हैं, रास्ते वही हैं, लेकिन बहुत कुछ बदल गया है।
फिर भी जब कभी मैं उन रास्तों से गुजरता हूं, तो दीदी की यादें मेरे साथ चलने लगती हैं।
मुझे वह छोटा बच्चा याद आता है, जिसकी तबीयत खराब होने पर दीदी को बुलाया जाता था।
मुझे वह क्रिकेट का मैदान याद आता है, जहां से हमारी गेंद बार-बार दीदी के घर में पहुंच जाती थी।
मुझे वह मुस्कान याद आती है, जिसके साथ वह हर बार हमें माफ कर देती थीं।
मुझे वह आवाज याद आती है, जो हर मुलाकात पर पूछती थी—
“कैसे हो बेटा?”
और मुझे वह ममता याद आती है, जिसने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं केवल पड़ोस का बच्चा हूं।
आज जब उन सभी पलों को याद करता हूं, तो आंखें अपने आप नम हो जाती हैं। कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते, लेकिन उनका महत्व खून के रिश्तों से भी कहीं अधिक होता है। दीदी मेरे जीवन में ऐसा ही एक रिश्ता थीं।
उन्होंने मुझे केवल प्यार नहीं दिया, बल्कि अपनेपन का वह एहसास दिया, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है। उन्होंने मुझे सिखाया कि सच्चा स्नेह किसी रिश्ते का मोहताज नहीं होता, वह केवल दिल से दिल तक पहुंचता है।
उनकी मुस्कान, उनका आशीर्वाद, उनका स्नेह और उनका अपनापन मेरे जीवन की सबसे अनमोल धरोहर हैं। और जब भी मैं अपने जीवन के सबसे सुंदर अध्यायों को याद करूंगा, उनमें श्रीमती यशोदा मिश्रा “दीदी” का नाम सबसे सम्मान और प्रेम के साथ लिखा होगा।
आप भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन आपकी ममता की छांव आज भी हमारे जीवन पर वैसे ही बनी हुई है, जैसे बचपन में थी।
दीदी केवल एक व्यक्ति नहीं थीं, वे पूरे गांव के लिए मां के समान थीं। उनकी स्मृतियां, उनका स्नेह और उनका आशीर्वाद सदैव हमारे हृदय में जीवित रहेंगे। 🙏🌹❤️
