
आपकी श्रद्धांजलि को कहानी के रूप में अधिक भावनात्मक और प्रवाहपूर्ण शैली में इस प्रकार लिखा जा सकता है:
मैं अमित शर्मा हूँ।
आज जब मैं स्वर्गीय श्रीमती यशोदा बाई मिश्रा जी, हमारी प्रिय “दुलहरा वाली दादी”, को याद करता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे स्मृतियों का एक विशाल संसार मेरे सामने जीवंत हो उठता है। कुछ लोग अपने जीवन में केवल रिश्ते नहीं बनाते, बल्कि अपने व्यवहार, स्नेह और कर्मों से लोगों के हृदयों में एक स्थायी स्थान बना लेते हैं। दादी भी ऐसी ही महान आत्मा थीं।
आज भी जब मैं उनके पैतृक घर की ओर जाता हूँ, तो ऐसा महसूस होता है मानो वे अभी भी आँगन में बैठी हों और आने-जाने वालों का हालचाल पूछ रही हों। उनकी मुस्कान में अपनापन था, उनकी बातों में मिठास थी और उनके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था कि जो भी उनसे मिलता, उनका अपना बन जाता।
मेरे परिवार के लिए दादी केवल पड़ोस की एक बुजुर्ग महिला नहीं थीं, बल्कि परिवार की अभिभावक थीं। महीने में चार-पाँच दिन उनका हमारे घर आना-जाना लगा रहता था। उन्होंने कभी अपने और पराए का भेद नहीं किया। हम चारों भाई-बहनों को यदि कभी पेट दर्द, हाथ-पैर में तकलीफ या कोई अन्य छोटी-मोटी समस्या होती, तो माता-पिता हमें सीधे दादी के पास ले जाते थे।
दादी के पास देशी वैद्यक का अद्भुत ज्ञान था। जड़ी-बूटियों और घरेलू उपचारों के ऐसे सरल और प्रभावी उपाय उन्हें मालूम थे कि कई बार हमारी तकलीफ कुछ ही देर में दूर हो जाती थी। उस समय हमें लगता था कि दादी के हाथों में कोई जादू है। लेकिन आज समझ आता है कि वह जादू उनके अनुभव, ज्ञान और सेवा-भाव का परिणाम था।
दादी का जीवन केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं था। गाँव में किसी के घर सुख का अवसर हो या दुःख का समय, वे सबसे पहले पहुँचने वालों में होती थीं। सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी उन्हें गाँव की एक सम्मानित और प्रभावशाली महिला बनाती थी। उम्र बढ़ती रही, जिम्मेदारियाँ बढ़ती रहीं, लेकिन समाज के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ।
समय के साथ मुझे शिक्षक बनने का अवसर मिला। संयोग से मैंने उनके दो नातियों, राज और ऋषि, को पढ़ाया। उसके बाद से दादी मुझे स्नेहपूर्वक “मास्टर” कहकर बुलाने लगीं। उनके मुख से यह संबोधन सुनना मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं था। जब भी मैं उनके घर जाता, वे मुस्कुराकर कहतीं—”आओ मास्टर, कैसे हो?” और मैं स्वयं को उनके स्नेह के सामने नतमस्तक पाता।
मुझे आज भी हमारी अंतिम मुलाकात याद है। उनके निधन से लगभग दो माह पहले मैं उनसे मिलने गया था। बढ़ती उम्र और पारिवारिक जिम्मेदारियों की थकान उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन उनकी आँखों में वही दृढ़ता, वही साहस और वही जीवन के प्रति संघर्षशीलता बनी हुई थी। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मजबूत व्यक्ति कभी हार नहीं मानते।
आज दादी हमारे बीच नहीं हैं। उनका आँगन सूना हो गया है, उनकी आवाज अब सुनाई नहीं देती, लेकिन उनकी स्मृतियाँ आज भी हर उस व्यक्ति के दिल में जीवित हैं जिसने उनके स्नेह को महसूस किया है। उनके संस्कार, उनकी सीख, उनका निस्वार्थ सेवा-भाव और लोगों के प्रति उनका प्रेम आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करता रहेगा।
कुछ लोग दुनिया से विदा होकर भी कभी दूर नहीं जाते। वे यादों में बस जाते हैं, संस्कारों में जीवित रहते हैं और हर उस व्यक्ति के हृदय में अमर हो जाते हैं जिसे उन्होंने प्रेम दिया हो।
दुलहरा वाली दादी भी ऐसी ही थीं।
दादी से जुड़ी मेरी सबसे प्यारी यादें मेरे बचपन की हैं। लगातार लगभग तीन वर्षों तक मैं प्रतिदिन उनके घर दूध लेने जाया करता था। जैसे ही मैं पहुँचता, दादी बड़े स्नेह से मुझे अपने पास बैठातीं और बिना नाश्ता कराए कभी वापस नहीं भेजती थीं। उस समय शायद मुझे यह केवल एक रोज़मर्रा की बात लगती थी, लेकिन आज समझ आता है कि वह उनके प्रेम और अपनत्व का प्रतीक था।
बचपन की शरारतें भी दादी की यादों से जुड़ी हुई हैं। उनके घर के पीछे सीताफल के पेड़ थे और हम दोस्तों का समूह अक्सर वहाँ सीताफल “चोरी” करने पहुँच जाता था। लेकिन हमारी सारी चालाकियाँ दादी की नजरों से बच नहीं पाती थीं। वे हमेशा हमें पकड़ लेती थीं। सबसे पहले मुझे अपने पास बैठाकर अच्छी तरह डाँटतीं, और मैं सिर झुकाकर उनकी बातें सुनता रहता। लेकिन उनकी डाँट में भी ममता छिपी होती थी। कुछ ही देर बाद वे घर के अंदर जातीं और अपने हाथों से चुने हुए पके, मीठे सीताफल लाकर प्यार से खिलातीं। उस समय समझ नहीं आता था कि डाँट ज्यादा बड़ी थी या उनका प्यार।
मुझे आज भी एक घटना बिल्कुल स्पष्ट याद है। हम सभी दोस्त दादी के घर के सामने क्रिकेट खेल रहे थे। खेलते-खेलते गेंद सीधे उनके घर के अंदर चली गई। गेंद जाते ही मैदान में सन्नाटा छा गया। किसी भी लड़के की हिम्मत नहीं थी कि जाकर दादी से गेंद माँग सके। आखिरकार यह जिम्मेदारी मेरे हिस्से आई।
मैं डरते-डरते उनके घर की ओर बढ़ा। जैसे-जैसे उनके करीब पहुँच रहा था, मेरे कदम और भारी होते जा रहे थे। उनके चेहरे का तेज, उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व और उनके प्रति मन में सम्मान इतना था कि मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। मेरे मन में बार-बार यही विचार आ रहा था कि आखिर उनसे गेंद कैसे माँगूँ।
मैं उनके सामने पहुँच तो गया, लेकिन शब्द मेरे होंठों तक नहीं आ रहे थे। घबराहट इतनी बढ़ गई कि अचानक मेरी आँखों से आँसू निकलने लगे। मैं रो पड़ा।
मेरी यह हालत देखकर दादी को हँसी आ गई। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया, प्यार से सिर पर हाथ फेरा और बड़े स्नेह से चुप कराया। फिर अंदर जाकर गेंद लेकर आईं। लेकिन उन्होंने केवल गेंद ही नहीं लौटाई, बल्कि मेरी हथेली पर पाँच रुपए भी रख दिए और कहा, “जाओ, अपने दोस्तों के साथ नमकीन खा लेना।”
जब मैं गेंद और पाँच रुपए लेकर अपने दोस्तों के पास वापस पहुँचा तो सभी हैरान थे। जो लड़के मुझे चिंता भरी नजरों से जाते हुए देख रहे थे, वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मैं गेंद भी ले आया और नमकीन खाने के पैसे भी।
असल में दादी का स्वभाव ही ऐसा था। बच्चों के प्रति उनके मन में असीम स्नेह था। हाँ, शुरुआत में वे अपना सख्त रूप जरूर दिखाती थीं, जिससे हम जैसे नटखट बच्चों के मन में उनका थोड़ा भय बना रहता था। लेकिन जो उनके पास पहुँच जाता था, उसे उनके भीतर छिपा ममता से भरा हृदय दिखाई दे जाता था।
आज भी मेरे वे दोस्त इस बात का रहस्य नहीं जानते कि उस दिन मैं दादी से गेंद कैसे लेकर आया था। लेकिन मैं जानता हूँ कि उस दिन मुझे गेंद इसलिए नहीं मिली थी क्योंकि मैं उसे माँगने गया था, बल्कि इसलिए मिली थी क्योंकि दादी के हृदय में बच्चों के लिए अथाह प्रेम था।
