
जादूगर दादी
बहुत खुशनसीब होते हैं वे बच्चे जिन्हें बचपन में दादा-दादी और नाना-नानी का प्यार मिलता है। मैं भी खुद को उन खुशकिस्मत लोगों में गिनता हूँ, जिन्हें एक नहीं बल्कि दो-दो दादियों का स्नेह मिला। एक दादी वे थीं जिन्हें मैं बचपन से जानता था, और दूसरी वे, जो हमेशा किसी सुरक्षा कवच की तरह मेरे आसपास मौजूद रहीं, लेकिन उन्हें समझने और जानने की उम्र मुझे लगभग दस-ग्यारह साल की उम्र में मिली।
मैं उन्हें प्यार से “जादूगर दादी” कहता था।
जादूगर इसलिए, क्योंकि उनके हाथों में सचमुच जादू था। गाँव में कोई बच्चा रो रहा हो, किसी को चोट लगी हो या कोई तकलीफ में हो, दादी बिना कुछ पूछे उसके पास पहुँच जातीं। उनके हाथों का एक स्नेहिल स्पर्श और बच्चे का रोना थम जाता। ऐसा लगता था जैसे दादी उसके मन की हर बात पढ़ लेती हों। उनके पास बैठते ही एक अजीब-सी तसल्ली मिलती थी कि अब सब ठीक हो जाएगा।
वैसे तो वे पूरे गाँव की दादी थीं। कोई उन्हें दादी कहता, कोई माताराम, तो कोई दीदी। हमारे इलाके में “दीदी” का मतलब माँ भी होता है, और शायद यही वजह थी कि हर कोई उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानता था।
दादी की सबसे बड़ी पहचान थी उनके पुराने घरेलू नुस्खे और नसों की अद्भुत जानकारी। गाँव में किसी को दर्द हो, मोच आ जाए या कोई छोटी-मोटी तकलीफ हो, सबसे पहले लोगों को दादी ही याद आती थीं। वे बिना किसी स्वार्थ के सबकी मदद करती थीं।
हालाँकि वे सभी बच्चों को बराबर प्यार करती थीं, लेकिन ऋषि और राज के बाद जो थोड़ा-सा स्नेह मुझे मिला, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता। हमारा खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन उन्होंने मुझे कभी इसका एहसास नहीं होने दिया। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो खून से नहीं, दिल से बनते हैं। ऐसे रिश्ते जिन्हें देखकर मन खिल उठता है, जिनके पास बैठकर सारी परेशानियाँ भूल जाती हैं।
दादी भी मेरे लिए ऐसा ही रिश्ता थीं।
उनके हाथों में जितना जादू था, उससे कहीं ज्यादा उनकी बातों में था। जब वे अपने स्नेह भरे स्वर में पूछतीं, “शनि, आज कुछ परेशान लग रहा है?” तो सच में लगता था जैसे सारी परेशानियाँ छुट्टी पर चली गई हों।
वे हमेशा दूसरों की तकलीफों में सबसे आगे खड़ी दिखाई देती थीं। किसी के घर दुख हो, किसी को मदद की जरूरत हो, दादी सबसे पहले वहाँ पहुँचती थीं। लेकिन विडंबना यह थी कि अपनी परेशानियों और दुखों में वे अक्सर अकेली ही रह जाती थीं।
मुझे आज भी याद है, अगर मैं कई दिनों तक गाँव न जाऊँ तो दादी किसी न किसी से मेरी खबर जरूर लेती थीं। पूछती थीं कि मैं ठीक हूँ या नहीं, गाँव में हूँ या बाहर चला गया हूँ।
जब भी मैं राज के घर जाता, तो दादी से वैसी ही नोकझोंक करता जैसे ऋषि और राज करते थे। कभी मेले में जाने के लिए पैसे माँगने की बात होती, तो कभी बाजार के दिन मिलने वाली बख्शीश की। उन छोटी-छोटी बातों में जो अपनापन था, वही आज सबसे ज्यादा याद आता है।
समय बीतता गया, लेकिन दादी का सम्मान पूरे गाँव में हमेशा बना रहा। वे न पंच थीं, न सरपंच, न कोई नेता। फिर भी गाँव के हर कार्यक्रम में उनका अपना एक विशेष स्थान था। लोग उनकी बात सुनते थे, उनका आदर करते थे। उन्होंने कोई पद नहीं पाया था, लेकिन अपने निःस्वार्थ सेवा भाव से जो सम्मान कमाया था, वह किसी भी पद से कहीं बड़ा था।
अगर कम शब्दों में कहूँ, तो उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा दूसरों के लिए जीया था।
लेकिन जिंदगी अपने खेल बड़े अनोखे ढंग से खेलती है।
एक दिन वह समय भी आया जब जादूगर दादी इस दुनिया को छोड़कर चली गईं। और मेरे मन में हमेशा के लिए एक कसक रह गई। अफसोस इस बात का नहीं कि वे चली गईं, अफसोस इस बात का है कि मैं उनके अंतिम क्षणों में उनसे मिल नहीं सका। उन्हें आखिरी बार देख नहीं सका।
आज भी जब उनकी याद आती है, तो मन यही सोचता है कि काश, मैं उनसे एक बार मिल पाता। उनके लिए कुछ कर पाता। उनके चरण छूकर बस इतना कह पाता—
“दादी, अगर अगला जन्म सच में होता है, तो मुझे फिर से आपका प्यार मिले। फिर से आपके आशीर्वाद की छाया मिले। और फिर से मुझे वही जादूगर दादी मिलें, जिनके हाथों में जादू था, जिनकी बातों में ममता थी, और जिनके दिल में पूरे गाँव के लिए अथाह प्रेम था।”
🙏🏻 जादूगर दादी, आप आज भले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपकी यादें, आपका स्नेह और आपका आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहेंगे।
