Rishi Mishra

मेरी दीदी — मेरी दादी, मेरी दुनिया

यशोदा मिश्रा (My LadyDon 💪🏻)

मैं ऋषि, आज अपने जीवन के उस सबसे अहम हिस्से को फिर से जी रहा हूँ, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता।
उस हिस्से का नाम है — मेरी दादी, मेरी “दीदी”, श्रीमती यशोदा मिश्रा।

आज वो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें आज भी मेरे अंदर सांस लेती हैं।
मैं उन्हें हर पल याद करता हूँ। उनके रहते मेरी जिंदगी इतनी आसान थी कि उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उनके होने से मुझे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हुई।

जब भी मैं घर से बाहर निकलता, वो अपने छोटे से थैले में हाथ डालकर कुछ पैसे निकालकर मुझे जरूर देती थीं। शायद उन्हीं पैसों की वजह से मैं कभी किसी के सामने शर्मिंदा नहीं हुआ। उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया।
जब तक वो थीं, मैं सच में राजा की तरह जीया।

उनका मुझ पर गुस्सा होना, और मेरा हँसते हुए उनकी डाँट सुनना — आज बहुत याद आता है।
उनके थैले से चुपके से 10 रुपए निकालना और फिर जाकर कहना —
“देखो दीदी, सिर्फ 10 रुपए ही निकाले हैं, ज्यादा नहीं लिए…”
और फिर हँसते हुए वहाँ से भाग जाना…
ये पल आज भी मेरी आँखों के सामने घूमते हैं।

मुझे उनके साथ बिताया हर छोटा-बड़ा पल याद आता है।
उनके साथ काम करना, उनके प्यारे जानवरों — कारी, कस्तूरी, काली, केसर, लाली, भूरी और मिस्टी — के लिए खाना बनाना, उनके साथ भूसा लेने जाना, सब कुछ याद आता है।

मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे ऐसी दादी मिली, जिनके नाम से लोग मुझे जानते थे।
आज मेरे पास जो भी पहचान है, वो सब उन्हीं की दी हुई है।
मैं उन्हें कभी नहीं भूल पाऊँगा।

मुझे आज भी याद है — जब मैं स्कूल में था और किसी चीज़ ने मुझे काट लिया था, तब दर्द में मेरे मुँह से “माँ” नहीं, बल्कि “दीदी… दीदी…” निकला था।
शायद इसलिए क्योंकि मेरे लिए माँ से बढ़कर अगर कोई था, तो वो मेरी दीदी थीं।

छत से गिरना, पैर में चोट लगना, भाई का मुझे घर ले जाना, फिर दीदी का मेरा इलाज करना…
बाजार के चबूतरे से गिरना, पेट में बॉल लगना, सिर में बैट लगना, उंगली में डंडा लगना, विनय के साथ साइकिल से गिर जाना…
हर दर्द में सबसे पहला नाम मेरी दीदी का ही आता था।
उनके पास जाकर इलाज कराना ही मेरे लिए सबसे बड़ी दवा होती थी।

लेकिन जिस दिन वो गईं… उस दिन जो चोट लगी, उसके बाद शरीर के बाकी दर्द समझ ही नहीं आते।
अब दर्द सहना सीख गया हूँ, क्योंकि सबसे बड़ा दर्द तो उन्हें खोने का था।

मेरी दीदी सिर्फ मेरी दादी नहीं थीं, वो पूरे गाँव और समाज के लिए सहारा थीं।
लोग अपनी समस्याएँ लेकर उनके पास आते थे और समाधान लेकर जाते थे।
छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लेकर प्यार करना, उन्हें अपने हाथों से खिलाना… ये सब दृश्य आज भी मेरी आँखों में बसे हुए हैं।

एक बात मुझे हमेशा याद रहेगी —
मैं शाम को जब भी घूमने निकलता था, चाहे किसी का फोन आए या न आए, मेरी दीदी का फोन जरूर आता था।
और वो कहती थीं —
“आजा दादू… दाहतींगा आ जई था… केबादा कर लेई…”

दीदी, सच में…
अब वो आवाज़ सुनने के लिए दिल तरस गया है।
तोर बहुत याद आऊ थे दीदी…

मेरी दीदी ने मेरे लिए इतना कुछ किया है कि मैं उसे जिंदगी भर गिन भी नहीं सकता।
जब बचपन में मेरे दोस्तों के पास पैसे नहीं होते थे, तब मुझे रोज पैसे मिलते थे।
उनके हाथ का बना “चिल्ला” आज भी दुनिया की सबसे स्वादिष्ट चीज़ लगता है।
कसम से, वैसा चिल्ला आज तक कोई नहीं बना पाया।

सर्दियों में सुबह ब्रेड, बरसात में चिल्ला और पकौड़े, गर्मियों में रोज आइसक्रीम…
हर मौसम की सब्जियाँ, आम, तरबूज, ककड़ी, खीरा…
हमारे लिए सब कुछ समय पर तैयार रहता था।

लेकिन इस साल, जब दीदी नहीं हैं…
सच कहूँ, अब इन सब चीज़ों के लिए तरस गए हैं।
अब कोई पूछने तक नहीं आता।
तब समझ आया कि लोग हमारे लिए नहीं, हमारी दीदी के सम्मान और उनके प्यार के लिए आते थे।

आज समझ आया —
हमारा नहीं, हमारी दादी का गुरूर था उस घर में।
उनके नाम और सम्मान की वजह से ही लोग हमारे घर आते थे।

दीदी, आप जहाँ भी रहो, हमेशा खुश रहो।
बस अपना आशीर्वाद बनाए रखना, ताकि मैं आपका नाम ऊँचा कर सकूँ।

और दीदी…
मुझे माफ कर देना।
मैं आपकी बीमारी को समझ नहीं पाया।
आज भी ठीक से सो नहीं पाता हूँ।
हर पल यही लगता है कि कहीं मेरी वजह से तो ये सब नहीं हुआ।
मैं खुद को माफ नहीं कर पा रहा हूँ… और शायद कभी कर भी नहीं पाऊँगा।

लेकिन दीदी, अगर कहीं से मेरी बातें सुन रही हो…
तो अपने इस छोटे नाती को माफ कर देना।

बाजार से जलेबी लाना, बाहर से लौटते समय मेरे लिए कुछ न कुछ लेकर आना…
मेरे लिए इतना सब करने वाली दीदी को मेरा शत-शत नमन।

आपने मेरे जैसे नालायक को जीना सिखाया।
मैं आपका ये कर्ज कभी नहीं उतार पाऊँगा।
मैं आपके लिए कुछ नहीं कर पाया…
उसके लिए मुझे माफ कर देना दीदी।

आपका प्यारा छोटा नाती

ऋषि

जो आपको हर पल याद करता है…
और हमेशा करता रहेगा। 😭

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