
दीदी की स्मृतियों में…
कहते हैं कि व्यक्ति के नाम का व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मेरे जीवन में यह सौभाग्य यशोदा मिश्रा (दीदी) के कारण मिला। वही थीं जिन्होंने मुझे मेरा नाम दिया, मेरी पहचान दी। हालांकि, उन्होंने शायद ही कभी मुझे उस नाम से पुकारा हो। उनके लिए मैं हमेशा प्यार से “बिन्नू” ही था। आज भी जब मेरा छोटा भाई मुझे उसी नाम से पुकारता है, तो अनायास ही दीदी की यादें मन में ताज़ा हो उठती हैं।
रिश्ते में दीदी हमारे घर की छोटी दादी थीं, लेकिन गुणों और कलाओं में सबसे बड़ी थीं। मैं अक्सर मज़ाक में कहा करता था कि दीदी बिना डिग्री की डॉक्टर हैं। उनके हाथों में जैसे ईश्वर ने कोई अद्भुत कला दी थी। रात में अक्सर दूर-दूर के गाँवों से लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर आते। पड़ोस में बच्चों के रोने की आवाज़ सुनते ही समझ आ जाता कि कोई “सुतिया वाला” बच्चा आया है। पता नहीं उनके हाथों में कैसी जादुई शक्ति थी कि दस-पंद्रह मिनट बाद वही बच्चा और उसके माता-पिता मुस्कुराते हुए वापस लौटते थे।
दीदी के साथ बिताई मेरी यादें थोड़ी धुंधली हैं, क्योंकि जब मैं उनके साथ अधिक समय बिताता था, तब बहुत छोटा था। और जब समझने की उम्र आई, तब पढ़ाई और पिताजी की नौकरी के कारण घर से बाहर ही रहना पड़ा। फिर भी, साल में जब भी दो-तीन महीने के लिए घर आता, मुझे हमेशा उनका स्नेह और अपनापन मिलता। उनकी हल्की-फुल्की नोंक-झोंक, मीठी डाँट और प्यार भरी गालियाँ—आज सब केवल यादें बनकर रह गई हैं।
दीदी का स्वभाव अत्यंत प्रसन्नचित्त और ऊर्जा से भरपूर था। चाहे कितनी भी थकान हो या कितनी भी परेशानी, जब भी मिलतीं तो चेहरे पर वही मुस्कान और होंठों पर वही शब्द होते—“का है बिन्नू?” आज भी वह आवाज़ कानों में गूँजती है। बचपन में भाइयों के साथ खेलते हुए न जाने कितनी शरारतें कीं, लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि उन्होंने कभी मुझे कठोरता से डाँटा हो। हमेशा प्यार से समझाया, अपनापन दिया।
सर्दियों की शामें भी कितनी सुहानी होती थीं। आग तापते हुए गाँव के मज़ेदार किस्से सुनना, साथ में भुट्टे खाना और उन कहानियों को सुनाने का दीदी का अनोखा अंदाज़—पता ही नहीं चलता था कि समय कब बीत गया। आज वे पल किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं लगते।
दीदी का पूरा जीवन कर्म और सेवा का दूसरा नाम था। सुबह उठते ही रसोई से दिन की शुरुआत होती और देर रात तक घर-परिवार के अनगिनत कामों में लगी रहतीं। इसके बाद भी बिना किसी स्वार्थ के लोगों की सहायता करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। यही उनकी सच्ची मानवता थी।
उन्होंने अपने जीवन का हर कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाया। एक माँ के रूप में अपने बच्चों का पालन-पोषण, भाइयों की शिक्षा की चिंता, परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखने का संघर्ष—हर जिम्मेदारी को उन्होंने पूरे साहस और समर्पण के साथ निभाया। विपरीत परिस्थितियों में भी उनके चेहरे की मुस्कान कभी कम नहीं हुई।
आज भी जब कभी घर जाता हूँ, तो वह तख्त अपनी जगह पर वैसे ही रखा दिखाई देता है। लेकिन उसे देखकर मन भारी हो जाता है, क्योंकि अब उस पर बैठकर “का है बिन्नू?” कहने वाली दीदी नहीं हैं। कहते हैं कि बच्चों से घर में रौनक होती है, लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि हमारे घर की असली रौनक तो दीदी ही थीं। उनके जाने के बाद जैसे घर का एक हिस्सा हमेशा के लिए खाली हो गया।
सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि दीदी हम सबको इतनी जल्दी और अचानक छोड़कर चली गईं। लेकिन ईश्वर की इच्छा के आगे किसी का वश नहीं चलता। यही सोचकर मन को समझा लेता हूँ।
दीदी, आप आज हमारे बीच भले ही नहीं हैं, लेकिन आपका स्नेह, आपके संस्कार, आपका आशीर्वाद और आपकी यादें हमेशा हमारे साथ रहेंगी। आप हमारे जीवन का ऐसा अध्याय हैं, जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी पुण्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और हमें आपके दिखाए हुए मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।
आपका अपना,
“बिन्नू”
विनय भास्कर मिश्रा
